Friday, 10 March 2017

५ जनवरी (पैतृक जिज्ञासा) - कविता

५ जनवरी (पैतृक जिज्ञासा) - कविता


बाबा के वंश बढ़ाने की, जिज्ञासा लेकर आये हो।
पिता के सारे बोझ उठाने, कुली बनकर आये हो॥
माँ के कोख की लाज बने, और पैतृक दीपक बन आये थे।
बाबा के वंश बढ़ाने की बस, खुशियाँ लेकर आये थे॥
वंश के उस खालीपन में, चहल-पहल बन आये थे।
काली-अँधेरी रात में तुम, रौशन बनकर आये थे॥
मौसम के हर मार से बस, हमें बचाने आये हो।
बाबा के मान बढ़ाने की हर कसमे लेकर आये हो॥

बाबा के वंश बढ़ाने की, जिज्ञासा लेकर आये हो।
हर पर्व के उल्लास में तुम उत्सुक होकर आये हो॥
बच्चो के हर ख्वाइश में तुम, पूरक बनकर आये हो।
रिश्तो के हर दर्द में तुम, दवा बनकर आये हो॥
जीवन के उस फीकेपन में रंग दिलाने आये हो।
जीवन के उस तन्हे पल में रमन-चमन बन आये हो॥
जीवन के हर दौड़ में, दौड़ाने की कसमें लेकर आये हो।
बाबा के मान बढ़ाने की हर कसमे लेकर आये हो॥

बाबा के वंश बढ़ाने की, जिज्ञासा लेकर आये हो।
ये दिन हमारे जीवन में सूरज बनकर आये बस॥
ये पल हमारे जीवन में खुशियाँ लेकर आये बस।
आप हमारे जीवन में बस, खुशबु बनकर बसे रहो॥
ये राह हमारे जीवन को, मंजिल तक लेकर जाए बस।
ये साँस हमारे बच्चो को राहत की साँस दिलाये बस॥
ये रात हमारे जीवन में चंदा बनकर आये बस।
बाबा के मान बढ़ाने की हर कसमे लेकर आये हो॥

- मेनका

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