Friday, 30 December 2016

नैतिक पतन (हमारी निर्भया) - कविता

नैतिक पतन (हमारी निर्भया) - कविता


समाज का सिपाही, हर मोड़ पर खड़ा है।
कोई तो इसको समझे, कोई तो इसको जाने॥
पैसो के चमक-दमक में, भावें धूमिल पड़ी है।
पैसो के आन-बान में, भावें पड़ी है गिरवी॥
इस गुनाह की कतारें लगी हुई है लम्बी।
सब जातिवर्ग है शामिल, सब एज ग्रुप खड़ी है॥
पैसों के विकास में, भावें निरश खड़ी है।
जीना दुभर हुआ है, अपनों के बीच रहना॥

समाज का सिपाही, हर मोड़ पर खड़ा है।
कोई तो इसको समझे, कोई तो इसको जाने॥
किस हाल में पड़ी है, अपनों के बीच रिश्ता।
हर मोड़ पर खड़ा है, लुटेरा बना है अपना॥
हर भाव में भड़ा है, पैसों का शोर भारी।
हर जान में है अटकी, प्राणों का झुंड भारी॥
दबायें नहीं है दबता, आवाज़ मुक भारी।
आबाम की आवाज़ को कैसे करे अनदेखा॥

समाज का सिपाही, हर मोड़ पर खड़ा है।
कोई तो इसको समझे, कोई तो इसको जाने॥
आग तो लगी है, जलना अभी है बाकी।
हर घर में है भिखारी, पैसों का बस पुजारी॥
मंदिर हो या हो मस्जिद, गिरिजाघर हो या गुरुद्वारा।
भावों का कत्ल भइया, सरेयाम हो रहा है॥
पैसों का खुंखार जानवर, दर-दर भटक रहा है।
पैसों ने मारा रिश्ते, रिश्तों ने मारा भावें॥
हर वर्ग का सिपाही, हर मोड़ पर खड़ा है।
फिर भी हमारी न्याये दर-दर भटक रही है॥

- मेनका

Thursday, 15 December 2016

नोटों का पतझड़ - कविता

नोटों का पतझड़ - कविता 


हरी गुलाबी नीली- पीली, 
नोटों की बरसात लगी है।
भ्रष्टाचार के नाग नथैया,
मोदीजी आये है भइया।
भ्रष्टाचार के डंक ने भइया,
हम सबको है बड़ा रुलाया।
हरी गुलाबी नीली- पीली, 
नोटों की बरसात लगी है॥

मोदीजी का खेल तो भइया,
बड़ा ही अदभूत बड़ा है न्यारा।
नोटों के इस पतझड़ में तो,
हम सबको भी लड़ना होगा।
P.M  की लड़ाई भ्रष्टों से जारी,
हमारी लड़ाई तो कतारों से जारी।
हरी गुलाबी नीली- पीली, 
नोटों की बरसात लगी है॥

- मेनका

Friday, 11 November 2016

जय श्री बम-बम भोले - कविता

जय श्री बम-बम भोले - कविता


भोले बाबा हमारे है भोले-भोले।
भरते सदा है वो भक्तों की झोली
करते नहीं हैं वो एक पल की देरी
भोले बाबा को भावे हैं अदभूत व्यंजन
 भावों का भात और श्रद्धा की सब्जी
भावों का भोग भोले मन से लगाते
थालों का भोग भोले छूते नही हैं।
भोले बाबा हमारे है भोले-भोले॥

सावन महीना भोले को भाये
भांग धथूरा भोले को लुभाये
मृगा के छाल औढ़रदानी को भाये
पीला पीताम्बर भोले को लुभाये
अदभूत छवि है शंकरजी शंभाले
कालों के काल महाकाल विराजे
भोले बाबा हमारे है भोले-भोले॥

गंगा माँ  जटा में संभाले।
नाग और बिच्छ हैं तन पर विराजे
भूत और प्रेतों को हैं वो संभाले
कच्चा दूध भोले बाबा को भाये।
शमशानों के भभूत से बाबा हैं नहाये।
विष्णू अवतार हैभोले को रिझाये।
कामों के देव हैं उनके सहारे।
भोले बाबा हमारे है भोले-भोले॥

- मेनका

Saturday, 8 October 2016

नेवल हॉस्पिटल - कविता

नेवल हॉस्पिटल - कविता


काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते।
महाराष्ट्र के प्रांगण में, लोनावला के आँगन में॥

शिवाजी के गोद में, शोभ रही कस्तूरी है।
दिव्या मैम इसकी शान है तोह मिर्ज़ा सर इसके प्राण॥

प्रतिभाओं के फूलों और भावों की खुशबु से।
मरीज़ों में  डालते है वो प्राण....॥

काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते।


अस्पताल का रिसेप्शन हो या MI रूम।
अस्पताल का डिस्पेंसरी हो या हो यहाँ का लैब॥

अस्पताल का OPD हो या हो X-Ray रूम।
अस्पताल का फॅमिली वार्ड हो या हो जेंट्स वार्ड॥

अस्पताल का आपरेशन थिएटर हो या हो रसोई घर।
अस्पताल  का सफाई हो या हो यहाँ की सुव्यवस्था॥

हर जगह बिखेरे ओह जुनूनों की रौशनी।
काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते॥


हर मरीज़ों के घावों को तहे दिल से भरती।
हर मरीज़ों के भावों को तहे दिल से समझती॥

हर जगह बिखेरे वो प्रतिभावों की रौशनी। 
अगर प्रतिभा उसकी दिया है तोह, जूनून उसकी बाती॥

सुव्यवस्था के तेलों से हर-पल जले यह बाती।
काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते॥


दुश्मनों के बुरी नज़रों से वो खुद को बचाती।
अच्छे पलों को वो यूँ न गंवाती॥

सहजे-सँवारे वो सबके गुणों को।
बाहर भगाये वो अपने दुश्मनों को॥

उनकी लड़ाई बिमारी से जारी।
खुशियों को रहती गले वो लगाए॥

मरीज़ों के चेहरे पर खुशियाँ वो लाती।
काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते॥

- मेनका

परिवार के एडमिरल साहब - कविता

परिवार के एडमिरल साहब - कविता


मग्न है वो भाव से भोजन बना रही।
सजा  रही है वो व्यंजनों को प्रेम में है मग्न॥

भाव में विभोर है थाली सजा रही।
दे दिया आवाज वो आ जाये खाने को॥

कर दिया डिटेल और में हो गया डिस्टर्ब।
सो रहा था नींद में जगा दिया तूने॥

बना कर रख दो खाना और तू हो जाओ फ्री।
मत बना रिपोर्ट और तू मत करो कमांड॥

सज रही सवर रही, मंदिर है जाने को।
चल दिए है साथ में साहब भी जाने को॥

घर के कपड़ो में देखकर बोली वह साहब से।
बार-बार बोला है मैंने मत करो तुम चेक॥

मैं जो बोलता हूँ तुम वही किया करो।
मेरी कही बातो को तुम यूँ कट मत किया करो॥

- मेनका

Sunday, 28 August 2016

जामुन की टोकरी - कविता

जामुन की टोकरी - कविता


छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।
सपने संजोकर निकल पड़ी, व्वो टोकरी लिए॥
देख रहा हर पेड़ों को, आशा की दृष्टि से।
हिला रहा हर डाल को उम्मीद की बम्बू से॥
फटे-पुराने चादरे निगाहे टिकी  हुई।
कास के पकडे चादरों को झुंड खड़ी हुई॥


छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।
सहेज रही हर जामुनों को टोकरी में भर॥
बोहनी के नाम पर वोह खुश हो गई।
बाँधी ही थी टोकरी को आ गयी आफत॥
लगा रही गुहार है, आफत से बचने को।
आफत है कि तैयार नहीं उसे छोड़ने को॥


छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।
छीन लिए वो झुंड ने जामुन की टोकरी॥
बिखड़ गए वो सपने जो संजोकर निकली थी।
किसी के घर की रोटी है, तो किसी का टाइमपास॥
मरीज की दवा है तो बच्चों की ज़िन्दगी।
किसी के तन का कपड़ा है तो किसी की रौशनी॥
छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।

- मेनका

Wednesday, 17 August 2016

मेरी आकांक्षा - कविता

मेरी आकांक्षा - कविता 


आश नहीं मैं आंसू बनकर - दुनिया के दिलो में बस जाऊँ।
बस आश यही है खुशियाँ बनकर - सबके दिलो में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं चीटर बनकर - अपनी छवि बनाऊँ।
बस आश यही है आशा बनकर - सबके मन में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं लालच बनकर - दुसरो का धन-दौलत ले लूँ।
बस आश यही है - संतुष्टि को अपनी छवि बनाऊँ॥

आश नहीं मैं तृष्णा बनकर - काल-कोठरी में बस जाऊँ।
बस आश यही मैं समर्पण बनकर - अपनी खुशियों में बस जाऊँ॥

आश नहीं में क्रोधाग्नि बनकर - चिताग्नि को जलाऊँ।
बस यही मैं देवाग्नि बनकर - श्रद्धाग्नि में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं आरक्षण बनकर - भेद भाव में बंध जाऊँ।
बस यही मैं मेधावी बनकर - अपने जीवन को चमकाऊँ॥

आश नहीं मैं नफरत बनकर - अपनी नज़रों से गिर जाऊँ।
बस आश यही मैं आकर्षण बनकर - माँ के चरणों में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं बाधा बनकर - दुसरो के पथ को रो कूँ।
बस आह यही जूनून बनकर - हर सपने को साकार करूँ॥

आश नहीं मैं इंसानो से - गैरों सा व्यव्हार करूँ।
बस आश यही मैं दोस्त बनकर - अपनों सा व्यव्हार करूँ॥

- मेनका

Tuesday, 7 June 2016

मेरी माँ से ऊपर एक माँ - कविता

मेरी माँ से ऊपर एक माँ - कविता


ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही विराजे ज्वाला जी माँ, कही विराजे काली। 
हाथों में हथियार लिए माँ दुष्टों से है बचाती॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही खड़ी माँ चण्डी बनकर, कही बानी चामुण्डा।
कण - कण में है वास करे तू, भक्तों को है संभाला॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही सजी माँ नैना बनकर, कही सजी माँ वैष्णो।
भक्तों की तू झोली भरती, देती है तू दुआएँ॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही खड़ी माँ दुर्गा बनकर, कही बनी माँ लक्ष्मी।
भक्त पुकारे आर्त भाव से - हे माँ मुझे बचाओ॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

- मेनका

Wednesday, 25 May 2016

नारी की रौनकता - कविता

नारी की रौनकता - कविता


माँ की ममता के चमन में - कर रहा गुजार तू।
आहर सूना है जब से माँ ने - आवाज अपने लाल की॥

करती नहीं वो एक पल भी - देर अपने प्यार की।
ममता के साँसों की खुशबू - महक रही गुड़िया बनकर॥

दिल की धड़कन माँ का है तू - दमक रहा गुड्डा बनकर।
चहल - पहल है आँगन का तू - दरवाजे का नूर है तू॥

सज रहा है पालने में - जल रहे प्रतिद्वन्दियाँ।
सर्वस्व है तू ज़िन्दगी का - और है मसाल तू॥

गा रहा है गीत तू - और दे रहा आवाज़ तू।
ज़िन्दगी की राह है तू - और है पहचान तू॥

लक्ष्य है तू ज़िन्दगी का - दे दिया दस्तक है तू।
व्यक्तित्व है तू ज़िन्दगी का - कर दिया मालामाल है॥

किलकारियों की कलियाँ बनकर - खिल रहा वो प्यार का।
अरमानो के फूल बनकर - सज रहे व्यवहार में॥

ज़िन्दगी की शान है और - बढ़ा रहा गौरव है तू।
चिलचिलाती धुप की - बहुत बड़ी ठंडक है तू॥

ज़िन्दगी के मेघ ने जब दे दिया त्रासदी।
आ गए जहाज बनकर - दे दिया आराम तू॥

सजा रही है आरती की - थाल अपने दुलार की।
मग्न है वो काम में और - मस्त है बहार में॥

- मेनका

Tuesday, 24 May 2016

नारी का श्रृंगार - कविता

नारी का श्रृंगार - कविता


माथे की बिंदी बनकर - सज रहा सिंदूर तू।
मांग पर तू मांगटीका - सज रहा मंगलसूत्र तू॥

ओठों की तू लाली बनकर - चेहरे का मुस्कान है तू।
बदन ढका है जिस कपड़े से - उस कपड़े का रंग है तू॥

हाथों का तू कंगन बनकर - चूड़ियों की आवाज है तू।
महक रहा तू मेहदी बनकर - हाथों का श्रृंगार है तू॥

लटक  रहा है झुमका बनकर - कानों का श्रृंगार है तू।
नाकों में तू नथीया बनकर - चमक रहा कुंदन बनकर॥

चमक रहा तू पायल बनकर - पैरों की झनकार है तू।
ज़िन्दगी का जशन है तू - ज़िन्दगी की राह है तू॥
दीपावली की रौशनी तू - हर होली का रंग है तू।

- मेनका

Saturday, 21 May 2016

युवराज - कविता

युवराज - कविता


माँ के मन का मोर बनकर - बाप का सिर मौड़ बनकर। 
वंश का वंशज खड़ा है - दश का कर्णधार बनकर॥ 

माँ के मन का देव बनकर - ज़िन्दगी को जी रहा वह।
सोच रहा वह प्रत्येक क्षण है - आगे बढ़ने की चाह लिए॥

परिवार का उत्थान हो - या हो देश का उत्थान।
कुछ कर गुजरने की तमन्ना - हर समय है साथ लिए॥

दिन  हो या रात - स्वास्थ्य हो या हो बिमार।
रिश्तों के अच्छे मोती को - ढूंढ़ रहा वह तन्हा होकर॥

आरक्षण की काली अंधियारी -  देख रहा वह दूर खड़ा।
 कब आयेगी मेरी बारी? हर पल है वह चाह लिए॥

माँ के मन का मोर बनकर - बाप का सिर मौड़ बनकर।
वंश का वंशज खड़ा है - देश का कर्णधार बनकर॥

-  मेनका

Thursday, 19 May 2016

नन्ही परी - कविता

नन्ही परी - कविता


फूलों की मैं कलियाँ बनकर - माँ के मन की गुड़िया बनकर। 
इस दुनिया को देखा मैंने - पापा को पहचाना मैंने॥ 

दूर - दूर तक तन्हाई थी - दादी दर्द लिए बैठी थी। 
आस - पास के सारे बच्चे - मुझे देख कर खुश होते हैं॥ 

पापा की मैं इच्छा बनकर - दादा की प्रतीक्षा।
मम्मी की मैं रानी बेटी - दादी की हूँ परायी॥ 

फूला गाल बैठी हैं - मम्मी को कोस रही। 
दुनिया में क्यों लाई इसको - तूने मुझको दूर किया ॥ 

बड़ी हुई जब माँ की लाड़ली - अरमानो की रानी बनकर।
पापा के सपनों की रानी - अपने मन की हैं मनमानी॥

बहुत बड़ी हैं भीड़ खड़ी यह - आरक्षण की टोली बनकर।
माँ की बेटी मौन खड़ी हैं - सोच रही है तनहा होकर॥

-  मेनका

Saturday, 7 May 2016

नौसैनिक अस्पताल - कविता

नौसैनिक अस्पताल - कविता

INHS Kasturi


हमारी कस्तुरी - निराली कस्तुरी । 
प्यारी कस्तुरी - अनोखी कस्तुरी ॥ 

कस्तूरी का आँचल लहराता गगन में । 
समेटे हुए है वो कोहिनूर का हीरा॥ 
सभी के विचारों को है वो समझती। 
करती नहीं वो भेदभाव कभी भी॥

वीरों के तरह वो बिमारी से लड़ती। 
मुरझाये चमन में - बहारें वो लाती॥
अपने नामों के ऊपर खड़ा वो उतरती। 
समझती नहीं वो - दिन है या रात॥ 

हमारी कस्तूरी - निराली कस्तुरी । 
प्यारी कस्तूरी - अनोखी कस्तुरी॥ 

- मेनका

Monday, 28 March 2016

पुछथीन चन्द्रमा बहीनी सुरज भइया से बतीया - छठ के गीत ८७

पुछथीन चन्द्रमा बहीनी सुरज भइया से बतीया - छठ के गीत ८७

पुछथीन चन्द्रमा बहीनी सुरज भइया से बतीया।
कहँमा लागल हो भइया एहो अति देरिया।
बाटे भेटल गे बहीना बाझीन तीरियबा।
पुत्र देअइते गे बहीन लागल अति देरिया।


हरि के कार्तिक महिनमा बड़ा सुदिनमा हे हरि - छठ के गीत ८४

हरि  के कार्तिक महिनमा बड़ा सुदिनमा हे हरि - छठ के गीत ८४

हरि  के कार्तिक महिनमा बड़ा सुदिनमा हे हरि।
हरि  हे छठी मईयां अयलन पहुनमा हे हरि।
हरि हे गाँव के बाहर बसे एक डोम्बा हे हरि।
हरि रे हरे बाँस डलबा बिनायब हे हरि।
हरि हे डालाबा में केलबा चढ़ायाब हे हरि।
हरि हे औहे लय छठी मईया के चढायब हे हरि।

Sunday, 27 March 2016

अलीया ही गलीया घुमे कोटवलबा - छठ के गीत २२

अलीया ही गलीया घुमे कोटवलबा - छठ के गीत २२

अलीया ही गलीया घुमे कोटवलबा।
बाबा के फरमाइस भेलइ जौड़े रे दऊरबा।
सेहे सुनी डोमबा के बेटबा तेजले परनमा।
कहमें से लवई माई हे जौड़े रे दऊरबा।
तोहरा के देबऊ रे डोमबा गोदी भरी बलकवा।

Saturday, 26 March 2016

सुतल रहली हो दीनानाथ मुनहर घर - छठ के गीत ८२

सुतल रहली हो दीनानाथ मुनहर घर - छठ के गीत ८२

सुतल रहली हो दीनानाथ मुनहर घर।
सपना जे देखली हो दीनानाथ तोहरो एवरुर।
झूठे तोहर बोलीया गे बाझीन झूठे तोहर बात।
झुनकी खरऊँआ हो दीनानाथ बाझीन द्वार।
सच्चे तोहर बोलीया गे बाझीन सच्चे तोहर बात।
जे कुछ मेंगबे गे बाझीन से कुछ मांग।
अन-अन लक्ष्मी हो दीनानाथ दिहली बहुत।
एकेगो पुत्र बीनु हे सुन संसार।
देबे केत देवऊ गे बाझीन गजाघर अइसन पुत्र।
गर्व जानी करबे गे बाझीन सेहो लेबऊ छीन।।


 

Thursday, 24 March 2016

केलबा मंगईली शहर से बालक दिहल जुठाय - छठ के गीत ८१

केलबा मंगईली शहर से  बालक दिहल जुठाय - छठ के गीत ८१

उजे  केलबा मंगईली शहर से  बालक दिहल जुठाय।
उजे तिरिया जे रोवले वियोग से अर्ग दिहलो न जाय ।
उजे छठी मइया बोलथीन गर्व से अर्ग हमें लेबो तोहार ।
उजे हमरो दिहल सुन्दर बालक अवगुण करब् माफ ।

उजे नारियल मंगईली शहर से बालक दिहल ...

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट २

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट २ पार्ट - २ जीवन का ये वृक्ष अनोखा, कभी न रहता खाली| शिक्षा को जीवन से जोड़े, अपनों को अपने से ...