Sunday, 28 May 2017

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट २

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट २


पार्ट - २

जीवन का ये वृक्ष अनोखा,
कभी न रहता खाली|
शिक्षा को जीवन से जोड़े,
अपनों को अपने से जोड़े|
धरती माँ की गोद में देखो,
गंगा माँ का आँचल|
सच्चाई के पथ पर देखो,
स्वर्ग बना है सुन्दर|

जीवन के ये वृक्ष अनोखा,
कभी न रहता खाली|
शिक्षा के उन हर मोती को,
लेने की करो तैयारी|
शिक्षा को उन्मुक्त गगन में,
उड़ने की हो आज़ादी|
भारत के आज़ाद भूमि पर,
मत कर नाइंसाफी|

जीवन के ये वृक्ष अनोखा,
कभी न रहता खाली|
हम सब तो माँ के बच्चे है,
फिर क्यों करे बेईमानी|
बेईमानी के बेकार शब्द पर,
परत पड़ा चालाकी का|
चालाकी तो तेज़ दिमाग का,
बहुत बड़ा अनमोल रत्न है|

जीवन के ये वृक्ष अनोखा,
कभी न रहता खाली|
तेज़ दिमाग अनमोल रत्न से,
संकट को दूर भगाओ|
भारत माँ के गोद में हमसब,
मिलकर स्वर्ग बनाओ|
कर्मों का फल सबको मिलता,
कोई न रहता खाली|

- मेनका

Saturday, 27 May 2017

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट १

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट १


पार्ट - १

जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|
कभी दिलाये माँ का आँचल,
कभी दिखाए सपने|
कभी चखाये रिश्तों का फल,
कभी लगाए चकरें|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

राजनीती का ये वृक्ष विचित्र है,
हर घर पर होता हावी|
औरत ही औरत का दुश्मन,
कभी न खाती तरसें|
अपनों को अपने से तोड़े,
अकड़ दिखाए हरदम|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

अंतर मन में दानव बैठा,
नकली नकाब साधू के  जैसा|
शिक्षा को पैसो से जोड़े,
अंतर मन है खाली|
दुसरो के मुँह की रोटी को,
हरदम लेने की तैयारी|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

कॉपी करती जीवन जीता,
वीरों जैसा रहता|
इंसानों जैसे मानव को वो,
परेशान करे है हरपाल|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

- मेनका

Friday, 26 May 2017

दशहरा की अधिष्ठात्री देवी - कविता

दशहरा की अधिष्ठात्री देवी - कविता


मैंने सुना है माँ दुष्टों की दुश्मन|
भारत के दुश्मन को पल में मिटा जा||
फौजों के जीवन है तेरे सहारे|
जीवन की डोर माँ तेरे हवाले||
भारत की धरती को फिर से बचा ले|
में तो आई हूँ माँ तेरे शरण में||

मैंने सुना है दुर्गे दुष्टों की दुश्मन|
भारत के दुश्मन को पल में मिटा जा||
फौजों के परिवार है तेरे सहारे|
तेरी सूरत माँ है मुझको लुभाये||
तेरा ही ध्यान माँ मुझको है भाये|
तेरी ही याद माँ मुझको सताये||

मैंने सुना है अम्बे दुष्टों की दुश्मन|
भारत के दुश्मन को पल में मिटा जा||
फौजों के परिवार है तेरे सहारे|
तेरी कृपा बिन माँ में जी सकू न||
छल और कपट न हो मेरे जीवन में|
झूट की छाया पड़े नहीं मुझ पर||

मैंने सुना है माँ दुष्टों की दुश्मन|
भारत के दुश्मन को पल में मिटा जा||
फौजों के जीवन है तेरे सहारे|
तेरा ही अटूट भक्त भारत के मालिक||
भारत की लाज माँ तेरे चरण में|
क्षण में संहार को भारत का दुश्मन||

- मेनका

Tuesday, 23 May 2017

दहेज़ का दानव - कविता

दहेज़ का दानव - कविता


दहेज़ के दानव से प्यारे, हर घर को अब लड़ना होगा|
बेटी के सपनों को प्यारे, उड़ने की आज़ादी दे दो||
बेटी के असली सूरत को, बहु रूप में लाना होगा|
तभी पढ़ेगी सबकी बेटी,  तभी बचेगी सबकी बेटी||
दहेज़ के दानव को प्यारे, कोशों दूर भगाना होगा|
बेटी और बेटा तो प्यारे एक  सिक्के के पहलू दो है||
बेटी की प्यारी सुरत को, दिल से अब अपनाना होगा|
बेटी और बेटा तो प्यारे, मत बाँटो तुम अपने दिल से||

दहेज़ के दानव से प्यारे, हर घर को अब लड़ना होगा|
वृद्धावस्था का डर भी प्यारे नहीं रहेगा सबके मन में||
सास-ससूर के जीवन में तो हर घर में ही जन्नत होगी||
दहेज़ को अब बहू रूप में हर जन को अपनाना होगा|
बेटी ही तो बहू रूप में, हम सबकी पालनकर्ता है||
दहेज़ के इस रौद्र-रूप को दुनिया से दूर भगाना होगा|
बेटी ही तो बहू रूप में, बेटा के दिल की धड़कन है||
दहेज़ के आगोश से प्यारे, बेटीयों को भी बचाना होगा|

दहेज़ के दानव से प्यारे, हर घर को अब लड़ना होगा|
बेटी ही तो बहू रूप में हर घर का पूरक बनती है||
दहेज़ के इस हवनकुंड से, बेटीयों को भी बचाना होगा|
बेटी ही तो लक्ष्मी रूप में, हर घर कि रौनक बनती है||
बेटी ही तो दुर्गा रूप में, हम सबकी रक्षा करती है|
मत मारो अब बेटी को प्यारे, जीने की आज़ादी दे दो||
नहीं बनेगा कोई आश्रय, हर घर ही आश्रय होगा|
बेटी ही तो वंश वृक्ष का बहू रूप में अंकुर बनती||
बेटी ही तो बहू रूप में वंशज का आश्रय बनती|
दहेज़ के दानव से प्यारे, हर घर को अब लड़ना होगा||

- मेनका

Friday, 19 May 2017

१८ मई २०१७ (भारत परिवर्तन) - कविता

१८ मई २०१७ (भारत परिवर्तन) - कविता


बदल रहा है देश हमारा, कितना सुन्दर कितना न्यारा|
सत्य अहिंसा चमक रहा है, कितना प्यारा कितना न्यारा||
भारत माँ के वीर सपूतों, दुनिया के आँगन में खेले|
सत्य न्याय चौखट पर शोभे, दुनिया का सरताज संभाले|
गरिमा, गौरव, न्याय संभाले, भारत माँ के लाल हमारे||
बदल रहा है देश हमारा, कितना प्यारा कितना न्यारा|

हरा भरा है देश हमारा, मत मारो तुम पत्थर प्यारे|
हम सबकी करनी-भरनी को सदा भुगतना होगा प्यारे||
पैसों के वैल्यू को प्यारे, शांति से मत आँको प्यारे|
वैष्णो माँ का देश दुलारा, सबसे प्यारा सबसे न्यारा||
बदल रहा है देश हमारा कितना सुन्दर कितना न्यारा|
सत्य अहिंसा चमक रहा है, कितना प्यारा कितना न्यारा||

माता के दिल की धड़कन है, दुनिया में है मान हमारा|
माता के पैरों की रुनझुन, दुनिया में है शान हमारा||
धरती माँ का रक्षक बोले, भारत माँ की जय हो प्यारे|
धरती माँ का देश दुलारा, दुनिया का सब राज दुलारा||
बदल रहा है देश हमारा, कितना सुन्दर कितना न्यारा|
सत्य अहिंसा चमक रहा है, कितना प्यारा कितना न्यारा||

- मेनका

Wednesday, 10 May 2017

हमारी प्रकृति - कविता

 हमारी प्रकृति - कविता


प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती
 हर पल बिखेरे है ख्वाबों की खुशबू |
प्रकृति कराती है सेल्फी की सेटींग ||
खुद ही संभाले है अपनी क्षबि को |
प्रकृति की ब्यूटी में सृष्टि की ब्यूटी ||
सजना संवरना हमें है सिखाती |
भावों की तरंगों को झंकृत वो करती ||
सपनों के महल में सदा है वो रहती |
फलों से रहित है वो झुकना सिखाती ||

प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती
दुनिया देखें है प्रकृति का सस्पेंस |
हमारी रगों में लहू बनकर बहती ||
साँसों की माला वो जपती है हरपल |
प्रकृति की गोद में हमारी सुरक्षा ||
हमारी व्यवस्था प्रकृति कराती |
गिरकर संभलना हमें वो  बताती ||
लेने से ज़्यादा वो देना सिखाती |
फूलों का खिलना है हंसना सिखाती ||

प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती
पल में हँसाये और पल में रुलाये |
पेड़ों की रक्षा हमारी सुरक्षा ||
हमारी प्रकृति से अद्भुत मिलन है |
योगा और योगी को सर पे बिठाती ||
अपने मरीज़ों को हर क्षण निहारे |
देश की देवी का सरताज है वो ||
मिलना-मिलाना हमें है सिखाती |
प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती ||

-  मेनका

मन मोहन सांवरिया - कविता

मन मोहन सांवरिया - कविता कहाँ जा छूपे हो मेरे वंशी वजैया| वंशी वजैया मेरे कृष्ण कन्हैया|| दरस दिखा जा मेरे नाग नथैया| आ जाओ मेरे प्र...