Wednesday, 10 May 2017

हमारी प्रकृति - कविता

 हमारी प्रकृति - कविता


प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती
 हर पल बिखेरे है ख्वाबों की खुशबू |
प्रकृति कराती है सेल्फी की सेटींग ||
खुद ही संभाले है अपनी क्षबि को |
प्रकृति की ब्यूटी में सृष्टि की ब्यूटी ||
सजना संवरना हमें है सिखाती |
भावों की तरंगों को झंकृत वो करती ||
सपनों के महल में सदा है वो रहती |
फलों से रहित है वो झुकना सिखाती ||

प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती
दुनिया देखें है प्रकृति का सस्पेंस |
हमारी रगों में लहू बनकर बहती ||
साँसों की माला वो जपती है हरपल |
प्रकृति की गोद में हमारी सुरक्षा ||
हमारी व्यवस्था प्रकृति कराती |
गिरकर संभलना हमें वो  बताती ||
लेने से ज़्यादा वो देना सिखाती |
फूलों का खिलना है हंसना सिखाती ||

प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती
पल में हँसाये और पल में रुलाये |
पेड़ों की रक्षा हमारी सुरक्षा ||
हमारी प्रकृति से अद्भुत मिलन है |
योगा और योगी को सर पे बिठाती ||
अपने मरीज़ों को हर क्षण निहारे |
देश की देवी का सरताज है वो ||
मिलना-मिलाना हमें है सिखाती |
प्रकृति हमें तो है जीना सिखाती ||

-  मेनका

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