Saturday, 27 May 2017

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट १

हमारी जीवन गाथा - कविता - पार्ट १


पार्ट - १

जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|
कभी दिलाये माँ का आँचल,
कभी दिखाए सपने|
कभी चखाये रिश्तों का फल,
कभी लगाए चकरें|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

राजनीती का ये वृक्ष विचित्र है,
हर घर पर होता हावी|
औरत ही औरत का दुश्मन,
कभी न खाती तरसें|
अपनों को अपने से तोड़े,
अकड़ दिखाए हरदम|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

अंतर मन में दानव बैठा,
नकली नकाब साधू के  जैसा|
शिक्षा को पैसो से जोड़े,
अंतर मन है खाली|
दुसरो के मुँह की रोटी को,
हरदम लेने की तैयारी|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

कॉपी करती जीवन जीता,
वीरों जैसा रहता|
इंसानों जैसे मानव को वो,
परेशान करे है हरपाल|
जीवन का ये वृक्ष विचित्र है,
कभी न रहता खाली|

- मेनका

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