Tuesday, 24 May 2016

नारी का श्रृंगार - कविता

नारी का श्रृंगार - कविता


माथे की बिंदी बनकर - सज रहा सिंदूर तू।
मांग पर तू मांगटीका - सज रहा मंगलसूत्र तू॥

ओठों की तू लाली बनकर - चेहरे का मुस्कान है तू।
बदन ढका है जिस कपड़े से - उस कपड़े का रंग है तू॥

हाथों का तू कंगन बनकर - चूड़ियों की आवाज है तू।
महक रहा तू मेहदी बनकर - हाथों का श्रृंगार है तू॥

लटक  रहा है झुमका बनकर - कानों का श्रृंगार है तू।
नाकों में तू नथीया बनकर - चमक रहा कुंदन बनकर॥

चमक रहा तू पायल बनकर - पैरों की झनकार है तू।
ज़िन्दगी का जशन है तू - ज़िन्दगी की राह है तू॥
दीपावली की रौशनी तू - हर होली का रंग है तू।

- मेनका

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