Saturday, 21 May 2016

युवराज - कविता

युवराज - कविता


माँ के मन का मोर बनकर - बाप का सिर मौड़ बनकर। 
वंश का वंशज खड़ा है - दश का कर्णधार बनकर॥ 

माँ के मन का देव बनकर - ज़िन्दगी को जी रहा वह।
सोच रहा वह प्रत्येक क्षण है - आगे बढ़ने की चाह लिए॥

परिवार का उत्थान हो - या हो देश का उत्थान।
कुछ कर गुजरने की तमन्ना - हर समय है साथ लिए॥

दिन  हो या रात - स्वास्थ्य हो या हो बिमार।
रिश्तों के अच्छे मोती को - ढूंढ़ रहा वह तन्हा होकर॥

आरक्षण की काली अंधियारी -  देख रहा वह दूर खड़ा।
 कब आयेगी मेरी बारी? हर पल है वह चाह लिए॥

माँ के मन का मोर बनकर - बाप का सिर मौड़ बनकर।
वंश का वंशज खड़ा है - देश का कर्णधार बनकर॥

-  मेनका

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