Tuesday, 17 October 2017

जीने की उत्कण्ठा - कविता

जीने की उत्कण्ठा - कविता



अजब हलचल सी मन में है, समझ में कुछ नहीं आता|
अजब सा ख्वाब खुशियों का, नाकारा ही नहीं जाता||
जिसे अपना समझती थी, वो गैरों से कही बढ़कर|
किसे अपना बनाऊ मैं, बता दे हे मेरे रघुबर||
सदा अपनों के दिल में ही, तुझे समझा मैं करती थी|
सदा अपनों में पा करके, मैं पूजा ही तोह करती थी||
प्रभु के प्यार के खातिर, जीना ही था मेरा मकसद|
प्रभु का हर वचन हरदम, हमारी कोशिशें जारी||
हमारा कर्म ही पूजा, इसी का ध्यान है रखा|
दरस दे ही मेरे रघुबर, परीक्षा अब न ले मेरी||

अजब हलचल सी मन में है, समझ में कुछ नहीं आता|
अजब सा ख्वाब खुशियों का, नाकारा ही नहीं जाता||
दशा इस दीन का आकर, दिशा दो हे मेरे रघुबर|
हमारी चूक हमसे ही, बता दे हे मेरे रघुबर||
मुझे लोगों के उलझन में, तो जीना ही नहीं आता|
मेरे सपनों में आकर के, मुझे जीना सिखा दे माँ||
मेरे जीवन की नौका को लगा दे, पार हे रघुबर|
मेरे औचित्य जीवन का बता दे, हे मेरे रघुबर||
मुझे सीधा सरल जीना, मेरे दिल को बहुत भाता|
गज़ब हलचल सी मन में है, समझ में कुछ नहीं आता||
गज़ब सा ख्वाब खुशियों का, नाकारा ही नहीं जाता|

- मेनका

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