Tuesday, 29 May 2018

देह त्याग कर किधर गए? - कविता

देह त्याग कर किधर गए? - कविता 


हम सबको छोड़ चले पिताजी
न जाने कैसे किधर गए?
माँ का जीवन तहस-नहस कर
न जाने कैसे कहाँ गए?
किसे सुनाऊँ खुशियाँ मैं और
किसे बताऊँ अपनी व्यथा?
पापा बिन बस दुनिया अब तो,
बेगाना जैसा लगता हैं|
ऐसी क्या मजबूरी थी
निष्ठूर बन कैसे कहाँ गए?
न जाने कैसे किधर गए?

हम सबको छोड़ चले पिताजी
न जाने कैसे कहाँ गए?
याद में तेरी माँ ने अब तो,
खाना भी है छोड़ दिया|
हम सबकी आस मरोड़ चले
न जाने कैसे किधर गए?
विलख-विलख कर रोते बच्चे
कैसे छोड़ कर कहाँ गए?
किसे देख कर में इठलाऊँ?
भाग्य बड़ा बनकर इतराऊं|
बिना बताये अनकहे शब्द तुम,
लेकर कैसे कहाँ गए?

- मेनका

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