Sunday, 8 July 2018

अलबेली जीवन शैली - कविता

अलबेली जीवन शैली - कविता


सावन की आई बहार तो झुमता चला गया, झूमता ही चला गया|
जीवन में मिले हर क्लास को लेता चला गया, लेता ही चला गया|
समय कि नयी किताब को पढता चला गया, पढता ही चला गया|
जीवन के हर मोड़ पर चलता चला गया, चलता ही चला गया|
सुनी पड़ी मशाल को जलाता चला गया, जलाता ही चला गया|
किस्मत की पड़ी मार तो रोता चला गया, रोता ही चला गया|
जीवन के हर जुगाड़ में जीता चला गया, जीता ही चला गया|
खाली पड़ी किताब को भरता चला गया, भरता ही चला गया||

सावन की आई बहार तो झुमता चला गया, झूमता ही चला गया|
समय के हर राग को गाता चला गया, गाता ही चला गया|
भावों के हर को फुहाड़ में भीगता चला गया, भीगता ही चला गया|
तोहफे में मिली किताब को सजाता चला गया, सजाता ही चला गया|
जीवन के हर उस भाव को समझता चला गया, समझता ही चला गया|
मौसम के हर उस स्वाद को चखता चला गया, चखता ही चला गया|
 जीवन के दिए हर जुर्म को सहता चला गया, सहता ही चला गया|
खाली पड़ी किताब को भरता चला गया, भरता ही चला गया||

सावन की आई बहार तो झुमता चला गया, झूमता ही चला गया|
भावों की पड़ी दबाव तो कहता चला गया,कहता ही चला गया|
जीवन के बनाये हर पैग को पीता चला गया, पीता ही चला गया|
समय के हर पड़ाव पर ठहरता चला गया, ठहरता ही चला गया|
ख़ुशियों के हर उस ख्वाब में खोता चला गया, खोता ही चला गया|
एहसासों के अन्तर्द्वन्द को लिखता चला गया, लिखता ही चला गया|
जीवन के हर उस रंग को रंगता चला गया, रंगता ही चला गया|
समय के हर कतार में लगता चला गया, लगता ही चला गया||

- मेनका

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